रविवार 14 जून 2026 - 05:00
इमाम खुमैनी और कर्बला का इंकेलाब

कर्बला के क्रांतिकारी संदेश को सिर्फ मातम तक सीमित नहीं रखना है, बल्कि उन्हें सामाजिक जागरूकता और ज़ुल्म व अत्याचार के खिलाफ़ आवाज़ उठाने का मंच बनाना है। इमाम खुमैनी की तरह हम भी इन धार्मिक सभाओं को सुधार का संदेश पहुँचाने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। और  हमें 'हर दिन आशुरा है, हर ज़मीन कर्बला है' के दर्शन को अपनाते हुए, जहाँ भी ज़ुल्म, नाइंसाफ़ी या शोषण हो, उसके खिलाफ़ आवाज़ उठानी चाहिए।

लेखकः डॉ सय्यद अब्बास महदी हसनी

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी ! इमाम खुमैनी ने कर्बला के इंक़लाब को केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि हर ज़माने में ज़ुल्म और ज़ालिम के खिलाफ़ आंदोलन का जीता-जागता नमूना बताया। कर्बला की उस घटना ने, जिसने झूठी ताकतों के सामने सिर न झुकाने का सबक दिया, इमाम खुमैनी के हाथों ईरान में एक क्रांति का रूप ले लिया।

इमाम खुमैनी  इस योजना को कई तरीकों से अमल में लाये:
पहला कदम यह था कि उन्होंने मजलिस, मातम और शोक-जुलूसों को राजनीतिक जागरूकता और समझ का ज़रिया बनाया। सय्यद-उश-शोहदा (इमाम हुसैन) के शोक का अच्छे तरीके से इस्तेमाल करते हुए उन्होंने लोगों में शाह के ज़ुल्म के खिलाफ़ चेतना जगाई।

उन्होंने अपने भाषणों में इमाम हुसैन के संदेश को इस्तेमाल करते हुए ईरान के शाह को 'यज़ीद-ए-वक़्त' (मौजूदा ज़माने का यज़ीद) कहा और लोगों को उसके खिलाफ़ उठने की सीख दी। 1963 में आशुरा के दिन उनके ऐतिहासिक भाषण ने क्रांति के आंदोलन को एक नई दिशा दी।

इमाम खुमैनी ने 'हर दिन आशुरा है, हर ज़मीन कर्बला है' के सिद्धांत को व्यावहारिक रूप दिया और लोगों को यह समझाया कि हर ज़माने में ज़ुल्म और ज़ालिम के खिलाफ़ सुनियोजित तरीके से उठना ज़रूरी है।

कर्बला के क्रांतिकारी संदेश को हम आज अपने समाज के सुधार में इस तरह अमल में ला सकते हैं:
पहली बात, हमें शोक-सभाओं (मजलिसों) को सिर्फ मातम तक सीमित नहीं रखना है, बल्कि उन्हें सामाजिक जागरूकता और ज़ुल्म व अत्याचार के खिलाफ़ आवाज़ उठाने का मंच बनाना है। इमाम खुमैनी की तरह हम भी इन धार्मिक सभाओं को सुधार का संदेश पहुँचाने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं।

दूसरी बात, हमें 'हर दिन आशुरा है, हर ज़मीन कर्बला है' के दर्शन को अपनाते हुए, जहाँ भी ज़ुल्म, नाइंसाफ़ी या शोषण हो, उसके खिलाफ़ आवाज़ उठानी चाहिए।

तीसरी बात, इमाम हुसैन की कुर्बानी का संदेश हमें अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर सामाजिक ज़िम्मेदारियाँ निभाने का सबक देता है। आज हम इसी जज़्बे के साथ शिक्षा, अर्थव्यवस्था और राजनीति में इस्लामी मूल्यों को अमली जामा पहना सकते हैं।

चौथी बात, हमें इमाम खुमैनी की तरह धार्मिक कार्यक्रमों को राजनीतिक और सामाजिक चेतना से जोड़ना होगा, ताकि ये कार्यक्रम ठहराव का कारण न बनें, बल्कि जागरूकता और आंदोलन का ज़रिया बनें।
सारांश यह है कि कर्बला की क्रांति सिर्फ अतीत की एक त्रासदी नहीं, बल्कि सत्य और सच्चाई के लिए कुर्बानी की एक अमिट वास्तविकता है, जिसे इमाम खुमैनी ने व्यावहारिक रूप से क्रांति में ढालकर दिखाया, और आज हमें भी इसी जज़्बे को बढ़ावा देने की ज़रूरत है।

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